निगम नेति सिव ध्यान न पावा
निगम नेति सिव ध्यान न पावा
चौपाई ६, दोहा २७ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा॥ कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई॥ ६ ॥
अर्थ
वेद जिनके विषय में “नेति-नेति' कहकर रह जाते हैं और शिवजी भी जिन्हें ध्यान में नहीं पाते (अर्थात् जो मन और वाणी से नितान्त परे हैं), वे ही श्रीरामजी माया से बने हुए मृग के पीछे दौड़ रहे हैं। वह कभी निकट आ जाता है और फिर दूर भाग जाता है। कभी तो प्रकट हो जाता है और कभी छिप जाता है।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “स्वर्ण मृग और मारीच वध” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा २७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मारीच का स्वर्ण मृग रूप धारण और श्रीराम द्वारा उसका वध तथा मोक्ष-प्रदान का वर्णन है।
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स्वर्ण मृग और मारीच वध