श्रीसीता हरण और श्रीसीता विलाप

रावण छल से सीताजी का हरण कर ले जाता है। वियोग में सीताजी करुण पुकार करती हैं और वन, पर्वत, नदी सब मानो उस दुख के साक्षी बन जाते हैं।

अरण्यकाण्ड · प्रकरण १२ / १८

प्रकरण पाठ

चौपाई

खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा॥ आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता॥ १ ॥

अर्थ:

दुष्ट मारीच को मारकर श्रीरघुवीर तुरंत लौट पड़े। हाथ में धनुष और कमर में तरकस शोभा दे रहा है। इधर जब सीताजी ने दुःखभरी वाणी (मरते समय मारीच की 'हा लक्ष्मण' की आवाज) सुनी तो वे बहुत ही भयभीत होकर लक्ष्मणजी से कहने लगीं--।

चौपाई

जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता॥ भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई॥ २ ॥

अर्थ:

तुम शीघ्र जाओ, तुम्हारे भाई बड़े संकट में हैं। लक्ष्मणजी ने हँसकर कहा-हे माता! सुनो, जिनके भ्रुकुटिविलास (भौंहें इशारे) मात्र से सारी सृष्टि का लय (प्रलय) हो जाता है, वे श्रीरामजी क्या कभी स्वप्न में भी संकट में पड़ सकते हैं ?।

चौपाई

मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला॥ बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू॥ ३ ॥

अर्थ:

इसपर जब सीताजी कुछ मर्म-बचन (हृदय में चुभनेवाले वचन) कहने लगीं, तब भगवान्‌की प्रेरणा से लक्ष्मणजी का मन भी चञ्चल हो उठा। वे श्रीसीताजी को वन और दिशाओं के देवताओं को सौंपकर वहाँ चले जहाँ रावणरूपी चन्द्रमा के लिये राहुरूप श्रीरामजी थे।

चौपाई

सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा॥ जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

रावण सूना मौका देखकर यति (संन्यासी) के वेष में श्रीसीताजी के समीप आया। जिसके डर से देवता और दैत्य तक इतना डरते हैं कि रात को नींद नहीं आती और दिन में [भरपेट] अन्न नहीं खाते--।

चौपाई

सो दससीस स्वान की नाईं। इत उत चितइ चला भड़िहाईं॥ इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा॥ ५ ॥

अर्थ:

वही दस सिरवाला रावण कुत्ते की तरह इधर-उधर ताकता हुआ भड़िहाई* (चोरी) के लिये चला। [काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे गरुड़जी ! इस प्रकार कुमार्ग पर पैर रखते ही शरीर में तेज तथा बुद्धि एवं बल का लेश भी नहीं रह जाता। * सूना पाकर कुत्ता चुपके-से बर्तन-भाँड़ों में मुँह डालकर कुछ चुरा ले जाता है, उसे 'भड़िहाई' कहते हैं।

चौपाई

नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई॥ कह सीता सुनु जती गोसाईं। बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं॥ ६ ॥

अर्थ:

रावण ने अनेकों प्रकार की सुहावनी कथाएँ रचकर सीताजी को राजनीति, भय और प्रेम दिखलाया। सीताजी ने कहा--हे यति गोसाईं! सुनो, तुमने तो दुष्ट की तरह वचन कहे।

चौपाई

तब रावन निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनावा॥ कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा॥ ७ ॥

अर्थ:

तब रावण ने अपना असली रूप दिखलाया और जब नाम सुनाया तब तो सीताजी भयभीत हो गयीं। उन्होंने गहरा धीरज धरकर कहा--“ओरे दुष्ट! खड़ा तो रह, प्रभु आ गये!'।

चौपाई

जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा॥ सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना॥ ८ ॥

अर्थ:

जैसे सिंह की स्त्री को तुच्छ खरगोश चाहे, वैसे ही अरे राक्षसराज ! तू [ मेरी चाह करके] काल के वश हुआ है। ये वचन सुनते ही रावण को क्रोध आ गया, परन्तु मन में उसने सीताजी के चरणों की वन्दना करके सुख माना।

दोहा

क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ। चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ॥ २८ ॥

अर्थ:

फिर क्रोध में भरकर रावण ने सीताजी को रथ पर बैठा लिया और वह बड़ी उतावली के साथ आकाशमार्ग से चला; किन्तु डर के मारे उससे रथ हाँका नहीं जाता था।

दोहा 29 के अंतर्गत
चौपाई

हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया॥ आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक॥ १ ॥

अर्थ:

[सीताजी विलाप कर रही थीं--] हा जगत् के अद्वितीय वीर श्रीरघुनाथजी! आपने किस अपराध से मुझपर दया भुला दी। हे दुःखों के हरनेवाले, हे शरणागत को सुख देनेवाले, हा रघुकुलरूपी कमल के सूर्य!

चौपाई

हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा॥ बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही॥ २ ॥

अर्थ:

हा लक्ष्मण! तुम्हारा दोष नहीं है। मैंने क्रोध किया, उसका फल पाया। श्रीजानकीजी बहुत प्रकार से विलाप कर रही हैं--[हाय!] प्रभु की कृपा तो बहुत है, परन्तु स्नेही प्रभु दूर रह गये हैं।

चौपाई

बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा॥ सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी॥ ३ ॥

अर्थ:

प्रभु को मेरी यह विपत्ति कौन सुनावे? यज्ञ के अन्न को गदहा खाना चाहता है। सीताजी का भारी विलाप सुनकर जड़-चेतन सभी जीव दुखी हो गये।