निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल

छन्द, दोहा २६ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

छन्द पाठ

निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं। श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं॥ निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी। निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी॥

अर्थ

[वह मन-ही-मन सोचने लगा] अपने परम प्रियतम को देखकर नेत्रों की सफलता करके सुख पाऊँगा। जानकीजी सहित और छोटे भाई लक्ष्मणजी समेत कृपानिधान श्रीरामजी के चरणों में मन लगाऊँगा। जिनका क्रोध भी मोक्ष देनेवाला है और जिनकी भक्ति उन अवश (किसी के वश में न होनेवाले स्वतन्त्र भगवान्‌) को भी वश में करनेवाली है, अहा! वे ही आनन्द के समुद्र श्रीहरि अपने हाथों से बाण सन्धानकर मेरा वध करेंगे!॥।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “स्वर्ण मृग और मारीच वध” प्रकरण का छन्द, दोहा २६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मारीच का स्वर्ण मृग रूप धारण और श्रीराम द्वारा उसका वध तथा मोक्ष-प्रदान का वर्णन है।

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स्वर्ण मृग और मारीच वध