बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु
बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु
दोहा २७ · अरण्यकाण्ड
दोहा पाठ
बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ। निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ॥ २७ ॥
अर्थ
देवता बहुत-से फूल बरसा रहे हैं और प्रभु के गुणों की गाथाएँ (स्तुतियाँ) गा रहे हैं [कि] श्रीरघुनाथजी ऐसे दीनबन्धु हैं कि उन्होंने असुर को भी अपना पद दे दिया।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “स्वर्ण मृग और मारीच वध” प्रकरण का दोहा २७ है। इस प्रकरण में मारीच का स्वर्ण मृग रूप धारण और श्रीराम द्वारा उसका वध तथा मोक्ष-प्रदान का वर्णन है।
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स्वर्ण मृग और मारीच वध