मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा

चौपाई ४, दोहा २७ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा॥ प्रभु लछिमनहि कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई॥ ४ ॥

अर्थ

हिरन को देखकर श्रीरामजी ने कमर में फेंट बाँधा और हाथ में धनुष लेकर उस पर सुन्दर (दिव्य) बाण चढ़ाया। फिर प्रभु ने लक्ष्मणजी को समझाकर कहा-हे भाई! वन में बहुत-से राक्षस फिरते हैं।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “स्वर्ण मृग और मारीच वध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मारीच का स्वर्ण मृग रूप धारण और श्रीराम द्वारा उसका वध तथा मोक्ष-प्रदान का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
स्वर्ण मृग और मारीच वध