तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा
तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा
चौपाई २, दोहा २५ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररूप चराचर ईसा॥ तासों तात बयरु नहिं कीजै। मारें मरिअ जिआएँ जीजै॥ २ ॥
अर्थ
तब उसने (मारीचने) कहा--हे दशशीश! सुनिये। वे मनुष्यरूप में चराचर के ईश्वर हैं। हे तात! उनसे बैर न कीजिये। उन्हीं के मारने से मरना और उनके जिलाने से जीना होता है।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “स्वर्ण मृग और मारीच वध” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मारीच का स्वर्ण मृग रूप धारण और श्रीराम द्वारा उसका वध तथा मोक्ष-प्रदान का वर्णन है।
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स्वर्ण मृग और मारीच वध