अत्रि मिलन एवं स्तुति
अत्रि मुनि के आश्रम में श्रीराम, सीताजी और लक्ष्मणजी का आदरपूर्वक स्वागत होता है। मुनि प्रेमपूर्वक प्रभु की स्तुति करते हैं और उनके आगमन से आश्रम धन्य हो उठता है।
अरण्यकाण्ड · प्रकरण ३ / १८
प्रकरण पाठ
रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना॥ बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना॥ १ ॥
अर्थ:
चित्रकूट में बसकर श्रीरघुनाथजी ने बहुत-से चरित्र किये, जो श्रुति के लिये अमृत के समान हैं। फिर श्रीरामजी ने मन में ऐसा अनुमान किया कि मुझे सब लोग जान गये हैं, इससे [यहाँ] बड़ी भीड़ हो जायगी।
पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए॥ करत दंडवत मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए॥ ३ ॥
अर्थ:
शरीर पुलकित हो गया, अत्रिजी उठकर दौड़े। श्रीरामजी को दौड़े आते देखकर और भी शीघ्र चले आये। दण्डवत् करते हुए मुनि ने श्रीरामजी को हृदय से लगा लिया और प्रेमाश्रुओं के जल से दोनों जनों को नहला दिया।
तमेकमद्भुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं। जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं॥ ९ ॥
अर्थ:
उन (आप) को जो एक (अद्वितीय), अद्भुत (मायिक जगत् से विलक्षण), प्रभु (सर्वसमर्थ), इच्छारहित, ईश्वर (सबके स्वामी), व्यापक, जगद्गुरु, सनातन (नित्य), तुरीय (तीनों गुणों से सर्वथा परे) और केवल (अपने स्वरूप में स्थित) हैं।
भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं। स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं॥ १० ॥
अर्थ:
[तथा] जो भावप्रिय, कुयोगियों (विषयी पुरुषों) के लिये अत्यन्त दुर्लभ, अपने भक्तों के लिये कल्पवृक्ष (अर्थात् उनकी समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाले), सम (पक्षपातरहित) और सदा सुखपूर्वक सेवन करनेयोग्य हैं; मैं निरन्तर भजता हूँ।