भजामि भाव वल्लभं
भजामि भाव वल्लभं
छन्द १०, दोहा ४ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
छन्द पाठ
भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं। स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं॥ १० ॥
अर्थ
[तथा] जो भावप्रिय, कुयोगियों (विषयी पुरुषों) के लिये अत्यन्त दुर्लभ, अपने भक्तों के लिये कल्पवृक्ष (अर्थात् उनकी समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाले), सम (पक्षपातरहित) और सदा सुखपूर्वक सेवन करनेयोग्य हैं; मैं निरन्तर भजता हूँ।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “अत्रि मिलन और स्तुति” प्रकरण का छन्द १०, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अत्रि मुनि द्वारा श्रीराम के आश्रम में स्वागत और भावपूर्ण स्तुति का वर्णन है।
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अत्रि मिलन और स्तुति