तमेकमद्भुतं प्रभुं
तमेकमद्भुतं प्रभुं
छन्द ९, दोहा ४ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
छन्द पाठ
तमेकमद्भुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं। जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं॥ ९ ॥
अर्थ
उन (आप) को जो एक (अद्वितीय), अद्भुत (मायिक जगत् से विलक्षण), प्रभु (सर्वसमर्थ), इच्छारहित, ईश्वर (सबके स्वामी), व्यापक, जगद्गुरु, सनातन (नित्य), तुरीय (तीनों गुणों से सर्वथा परे) और केवल (अपने स्वरूप में स्थित) हैं।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “अत्रि मिलन और स्तुति” प्रकरण का छन्द ९, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अत्रि मुनि द्वारा श्रीराम के आश्रम में स्वागत और भावपूर्ण स्तुति का वर्णन है।
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अत्रि मिलन और स्तुति