श्रीसीता-अनसूया मिलन और श्रीसीताजी को अनसूयाजी का पातिव्रत धर्म कहना
माता अनसूया सीताजी का स्नेह से स्वागत करती हैं और उन्हें पातिव्रत धर्म, धैर्य और मर्यादा का उपदेश देती हैं। यह मिलन आदर्श स्त्रीधर्म और गृहस्थ जीवन की पवित्र शिक्षा देता है।
अरण्यकाण्ड · प्रकरण ४ / १८
प्रकरण पाठ
मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी॥ अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही॥ ३ ॥
अर्थ:
हे राजकुमारी! सुनिये, माता, पिता, भाई सभी हित करनेवाले हैं, परन्तु ये सब एक सीमा तक ही [सुख] देनेवाले हैं। परन्तु हे जानकी! पति तो [मोक्षरूप] असीम [सुख] देनेवाला है। वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पति की सेवा नहीं करती।
ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना॥ एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥ ५ ॥
अर्थ:
ऐसे भी पति का अपमान करने से स्त्री यमपुर में भाँति-भाँति के दुःख पाती है। शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना स्त्री के लिये, बस, यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है।
जग पतिब्रता चारि बिधि अहहीं। बेद पुरान संत सब कहहीं॥ उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥ ६ ॥
अर्थ:
जगत में चार प्रकार की पतिव्रताएँ हैं। वेद, पुराण और संत सब ऐसा कहते हैं कि उत्तम श्रेणी की पतिव्रता के मन में ऐसा भाव बसा रहता है कि जगत् में [मेरे पति को छोड़कर] दूसरा पुरुष स्वप्न में भी नहीं है।
मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैसें॥ धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई॥ ७ ॥
अर्थ:
मध्यम श्रेणी की पतिव्रता पराये पति को कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो। (अर्थात् समान अवस्थावाले को वह भाई के रूप में देखती है, बड़े को पिता के रूप में और छोटे को पुत्र के रूप में देखती है।) जो धर्म को विचारकर और अपने कुल की मर्यादा समझकर बची रहती है, वह निकृष्ट (निम्नश्रेणी की) स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं।
बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई॥ पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई॥ ८ ॥
अर्थ:
और जो स्त्री मौका न मिलने से या भयवश पतिक्रता बनी रहती है, जगत् में उसे अधम स्त्री जानना। पति को धोखा देनेवाली जो स्त्री पराये पति से रति करती है, वह तो सौ कल्प तक रौरव नरक में पड़ी रहती है।
छन सुख लागि जनम सत कोटी। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी॥ बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥ ९ ॥
अर्थ:
क्षणभर के सुख के लिये जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुःख को नहीं समझती, उसके समान दुष्ट कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पातिव्रत-धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त करती है।
केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी॥ अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा॥ ५ ॥
अर्थ:
मैं किस प्रकार कहूँ कि हे स्वामी! आप अब जाइये ? हे नाथ! आप अन्तर्यामी हैं, आप ही कहिये। ऐसा कहकर धीर मुनि प्रभु को देखने लगे। मुनि के नेत्रों से [प्रेमाश्रुओं का] जल बह रहा है और शरीर पुलकित है।
तन पुलक निर्भर प्रेम पूरन नयन मुख पंकज दिए। मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए॥ जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई। रघुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई॥
अर्थ:
मुनि अत्यन्त प्रेम से पूर्ण हैं; उनका शरीर पुलकित है और नेत्रों को श्रीरामजी के मुखकमल में लगाये हुए हैं। [मन में विचार रहे हैं कि] मैंने ऐसे कौन-से जप-तप किये थे, जिसके कारण मन, ज्ञान, गुण और इन्द्रियों से परे प्रभु के दर्शन पाये। जप, योग और धर्म-समूह से मनुष्य अनुपम भक्ति को पाता है। श्रीरघुवीर के पवित्र चरित को तुलसीदास रात-दिन गाता है॥।