श्रीसीता-अनसूया मिलन और श्रीसीताजी को अनसूयाजी का पातिव्रत धर्म कहना

माता अनसूया सीताजी का स्नेह से स्वागत करती हैं और उन्हें पातिव्रत धर्म, धैर्य और मर्यादा का उपदेश देती हैं। यह मिलन आदर्श स्त्रीधर्म और गृहस्थ जीवन की पवित्र शिक्षा देता है।

अरण्यकाण्ड · प्रकरण ४ / १८

प्रकरण पाठ

चौपाई

अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता॥ रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई॥ १ ॥

अर्थ:

फिर परम शीलवती और विनम्र श्रीसीताजी [अत्रिजी की पत्नी] अनसूयाजी के चरण पकड़कर उनसे मिलीं। ऋषिपत्नी के मन में बड़ा सुख हुआ। उन्होंने आशिष देकर सीताजी को निकट बैठा लिया।

चौपाई

दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए॥ कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी॥ २ ॥

अर्थ:

और उन्हें ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाये, जो नित्य-नये, निर्मल और सुहावने बने रहते हैं। फिर ऋषिबधू ने सरस, कोमल वाणी से स्त्रियों के कुछ धर्म का बहाना करके कहने लगीं।

चौपाई

मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी॥ अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही॥ ३ ॥

अर्थ:

हे राजकुमारी! सुनिये, माता, पिता, भाई सभी हित करनेवाले हैं, परन्तु ये सब एक सीमा तक ही [सुख] देनेवाले हैं। परन्तु हे जानकी! पति तो [मोक्षरूप] असीम [सुख] देनेवाला है। वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पति की सेवा नहीं करती।

चौपाई

धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥ बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥ ४ ॥

अर्थ:

धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री—इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगवश, जड़, धनहीन, अन्धा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन—।

चौपाई

ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना॥ एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥ ५ ॥

अर्थ:

ऐसे भी पति का अपमान करने से स्त्री यमपुर में भाँति-भाँति के दुःख पाती है। शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना स्त्री के लिये, बस, यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है।

चौपाई

जग पतिब्रता चारि बिधि अहहीं। बेद पुरान संत सब कहहीं॥ उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥ ६ ॥

अर्थ:

जगत में चार प्रकार की पतिव्रताएँ हैं। वेद, पुराण और संत सब ऐसा कहते हैं कि उत्तम श्रेणी की पतिव्रता के मन में ऐसा भाव बसा रहता है कि जगत् में [मेरे पति को छोड़कर] दूसरा पुरुष स्वप्न में भी नहीं है।

चौपाई

मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैसें॥ धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई॥ ७ ॥

अर्थ:

मध्यम श्रेणी की पतिव्रता पराये पति को कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो। (अर्थात् समान अवस्थावाले को वह भाई के रूप में देखती है, बड़े को पिता के रूप में और छोटे को पुत्र के रूप में देखती है।) जो धर्म को विचारकर और अपने कुल की मर्यादा समझकर बची रहती है, वह निकृष्ट (निम्नश्रेणी की) स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं।

चौपाई

बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई॥ पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई॥ ८ ॥

अर्थ:

और जो स्त्री मौका न मिलने से या भयवश पतिक्रता बनी रहती है, जगत् में उसे अधम स्त्री जानना। पति को धोखा देनेवाली जो स्त्री पराये पति से रति करती है, वह तो सौ कल्प तक रौरव नरक में पड़ी रहती है।

चौपाई

छन सुख लागि जनम सत कोटी। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी॥ बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥ ९ ॥

अर्थ:

क्षणभर के सुख के लिये जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुःख को नहीं समझती, उसके समान दुष्ट कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पातिव्रत-धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त करती है।

चौपाई

पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई। बिधवा होइ पाइ तरुनाई॥ १० ॥

अर्थ:

किन्तु जो पति के प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर (भरी जवानी में) विधवा हो जाती है।

सोरठा

सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ। जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय॥ ५ (क) ॥

अर्थ:

स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किन्तु पति की सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है। [पातिव्रत धर्म के कारण ही] आज भी तुलसीजी भगवान् को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं।

सोरठा

सुनु सीता तव नाम सुमिरि नारि पतिब्रत करहिं। तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित॥ ५ (ख) ॥

अर्थ:

हे सीता! सुनो, तुम्हारा तो नाम ही ले-लेकर स्त्रियाँ पातिव्रत-धर्म का पालन करेंगी। तुम्हें तो श्रीरामजी प्राणों के समान प्रिय हैं, यह (पातिव्रत-धर्म की) कथा तो मैंने संसार के हित के लिये कही है।

दोहा 6 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि जानकी परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा॥ तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना॥ १ ॥

अर्थ:

जानकीजी ने सुनकर परम सुख पाया और आदरपूर्वक उनके चरणों में सिर नवाया। तब कृपानिधान श्रीरामजी ने मुनि से कहा--आज्ञा हो तो अब दूसरे वन में जाऊँ।

चौपाई

संतत मो पर कृपा करेहू। सेवक जानि तजेहु जनि नेहू॥ धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी॥ २ ॥

अर्थ:

मुझ पर निरन्तर कृपा करते रहियेगा और अपना सेवक जानकर नेह न छोड़ियेगा। धर्मधुरंधर प्रभु श्रीरामजी के वचन सुनकर ज्ञानी मुनि प्रेमपूर्वक बोले--।

चौपाई

जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी॥ ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे॥ ३ ॥

अर्थ:

ब्रह्मा, शिव और सनकादि सभी परमार्थवादी (तत्त्ववेत्ता) जिनकी कृपा चाहते हैं, हे रामजी! आप वही निष्काम पुरुषों के भी प्रिय और दीनों के बन्धु भगवान् हैं, जो इस प्रकार कोमल वचन बोल रहे हैं।

चौपाई

अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई॥ जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई॥ ४ ॥

अर्थ:

अब मैंने श्री चतुराई समझी, जिन्होंने सब देवताओं को छोड़कर आप ही को भजा। जिसके समान [सब बातों में] अत्यन्त बड़ा और कोई नहीं है, उसका शील भला, ऐसा क्यों न होगा ?।

चौपाई

केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी॥ अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा॥ ५ ॥

अर्थ:

मैं किस प्रकार कहूँ कि हे स्वामी! आप अब जाइये ? हे नाथ! आप अन्तर्यामी हैं, आप ही कहिये। ऐसा कहकर धीर मुनि प्रभु को देखने लगे। मुनि के नेत्रों से [प्रेमाश्रुओं का] जल बह रहा है और शरीर पुलकित है।

छन्द

तन पुलक निर्भर प्रेम पूरन नयन मुख पंकज दिए। मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए॥ जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई। रघुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई॥

अर्थ:

मुनि अत्यन्त प्रेम से पूर्ण हैं; उनका शरीर पुलकित है और नेत्रों को श्रीरामजी के मुखकमल में लगाये हुए हैं। [मन में विचार रहे हैं कि] मैंने ऐसे कौन-से जप-तप किये थे, जिसके कारण मन, ज्ञान, गुण और इन्द्रियों से परे प्रभु के दर्शन पाये। जप, योग और धर्म-समूह से मनुष्य अनुपम भक्ति को पाता है। श्रीरघुवीर के पवित्र चरित को तुलसीदास रात-दिन गाता है॥।

दोहा

कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल। सादर सुनहिं जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल॥ ६ (क) ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी का सुन्दर यश कलियुग के पापों का नाश करनेवाला, मन को दमन करनेवाला और सुख का मूल है। जो लोग इसे आदरपूर्वक सुनते हैं, उन पर श्रीरामजी प्रसन्न रहते हैं।

सोरठा

कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप। परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर॥ ६ (ख) ॥

अर्थ:

यह कठिन कलिकाल पापों का खजाना है; इसमें न धर्म है, न ज्ञान है और न योग तथा जप ही है। इसमें तो जो लोग सब भरोसों को छोड़कर श्रीरामजी को ही भजते हैं, वे ही चतुर हैं।