जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति
इंद्रपुत्र जयन्त कौए का रूप धरकर सीताजी को कष्ट पहुँचाता है। श्रीराम के अचूक बाण से भयभीत होकर वह अंततः शरण लेता है और अपने अपराध का फल भोगता है।
अरण्यकाण्ड · प्रकरण २ / १८
प्रकरण पाठ
काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही॥ मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना॥ ३ ॥
अर्थ:
किसी ने उसे बैठने तक के लिये नहीं कहा। श्रीरामजी के द्रोही को कौन रख सकता है? [काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़! सुनिये, उसके लिये माता मृत्यु के समान, पिता यमराज के समान और अमृत विष के समान हो जाता है।
मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी॥ सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥ ४ ॥
अर्थ:
मित्र सैकड़ों शत्रुओं-सी करनी करने लगता है। देवताओं की नदी उसके लिये वैतरणी हो जाती है। हे भाई! सुनिये, जो श्रीरघुबीर से विमुख होता है, समस्त जगत् उसके लिये अग्नि से भी अधिक गरम हो जाता है।
निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ॥ सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी॥ ७ ॥
अर्थ:
अपने किये हुए कर्म से उत्पन्न हुआ फल मैंने पा लिया। अब हे प्रभु! आपकी शरण तककर आया हूँ। [शिवजी कहते हैं—] हे पार्वती! कृपालु श्रीरघुनाथजी ने उसकी अत्यन्त आर्त वाणी सुनकर उसे एक नेत्र वाला करके छोड़ दिया।