जयन्त की कुटिलता और फलप्राप्ति

इंद्रपुत्र जयन्त कौए का रूप धरकर सीताजी को कष्ट पहुँचाता है। श्रीराम के अचूक बाण से भयभीत होकर वह अंततः शरण लेता है और अपने अपराध का फल भोगता है।

अरण्यकाण्ड · प्रकरण २ / १८

प्रकरण पाठ

सोरठा

उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति। पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति॥ ० ॥

अर्थ:

हे पार्वती! श्रीरामजी के गुण गूढ़ हैं, पण्डित और मुनि उन्हें समझकर वैराग्य प्राप्त करते हैं। परन्तु जो हरि से विमुख हैं और जिन्हें धर्म में रति नहीं है, वे मोहित होकर भ्रम में पड़ जाते हैं।

चौपाई

पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई॥ अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन॥ १ ॥

अर्थ:

पुरवासियों के और भरतजी के अनुपम और सुन्दर प्रेम का मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार गान किया। अब प्रभु के अत्यन्त पावन चरित्र सुनो, जो वन में देव, नर और मुनियों को भावते हैं।

चौपाई

एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए॥ सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर॥ २ ॥

अर्थ:

एक बार सुन्दर फूल चुनकर श्रीरामजी ने अपने हाथों से भूषण बनाये। प्रभु ने आदर के साथ उन भूषणों को श्रीसीताजी को पहनाया और सुन्दर स्फटिकशिला पर बैठे।

चौपाई

सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा॥ जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा॥ ३ ॥

अर्थ:

देवराज इन्द्र का पुत्र जयन्त कौए का रूप धरकर श्रीरघुनाथजी का बल देखना चाहता है। जैसे महान् मन्दबुद्धि चींटी समुद्र का थाह पाना चाहे।

चौपाई

सीता चरन चोंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा॥ चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना॥ ४ ॥

अर्थ:

वह मूढ़, मन्दबुद्धि कारणवश बना हुआ कौआ सीताजी के चरणों में चोंच मारकर भागा। जब रक्त बह चला, तब श्रीरघुनाथजी ने जाना और धनुष पर सरकंडे का बाण सन्धान किया।

दोहा

अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह। ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी, जो अत्यन्त कृपालु हैं और जिनका दीनों पर सदा स्नेह रहता है, उनसे भी उस अवगुणों के घर मूर्ख जयन्त ने आकर छल किया।

दोहा 2 के अंतर्गत
चौपाई

प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा॥ धरि निज रूप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

मन्त्र से प्रेरित होकर वह ब्रह्मबाण दौड़ा। कौआ भयभीत होकर भाग चला। वह अपना रूप धारण करके पिता के पास गया, पर श्रीरामजी का विरोधी जानकर उसे वहाँ नहीं रखा।

चौपाई

भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा॥ ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका॥ २ ॥

अर्थ:

तब वह निराश हो गया, उसके मन में त्रास उत्पन्न हुआ; जैसे दुर्वासा ऋषि को चक्र से भय हुआ था। वह ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि सब लोकों में थका हुआ, व्याकुल होकर भय और शोक से फिरता रहा।

चौपाई

काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही॥ मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना॥ ३ ॥

अर्थ:

किसी ने उसे बैठने तक के लिये नहीं कहा। श्रीरामजी के द्रोही को कौन रख सकता है? [काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़! सुनिये, उसके लिये माता मृत्यु के समान, पिता यमराज के समान और अमृत विष के समान हो जाता है।

चौपाई

मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी॥ सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥ ४ ॥

अर्थ:

मित्र सैकड़ों शत्रुओं-सी करनी करने लगता है। देवताओं की नदी उसके लिये वैतरणी हो जाती है। हे भाई! सुनिये, जो श्रीरघुबीर से विमुख होता है, समस्त जगत् उसके लिये अग्नि से भी अधिक गरम हो जाता है।

चौपाई

नारद देखा बिकल जयंता। लागि दया कोमल चित संता॥ पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही॥ ५ ॥

अर्थ:

नारदजी ने जयन्त को व्याकुल देखा तो उनके कोमल चित्त में दया आ गयी। उन्होंने उसे तुरंत श्रीरामजी के पास भेज दिया। उसने [जाकर] पुकारकर कहा— हे शरणागत-हितकारी! मेरी रक्षा कीजिये।

चौपाई

आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई॥ अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई॥ ६ ॥

अर्थ:

आतुर और भयभीत जयन्त ने जाकर श्रीरामजी के चरण पकड़ लिये [और कहा—] हे दयालु रघुनाथजी! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपके अतुलित बल और अतुलित प्रभुता को मैं मन्दबुद्धि समझ न पाया था।

चौपाई

निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ॥ सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी॥ ७ ॥

अर्थ:

अपने किये हुए कर्म से उत्पन्न हुआ फल मैंने पा लिया। अब हे प्रभु! आपकी शरण तककर आया हूँ। [शिवजी कहते हैं—] हे पार्वती! कृपालु श्रीरघुनाथजी ने उसकी अत्यन्त आर्त वाणी सुनकर उसे एक नेत्र वाला करके छोड़ दिया।

सोरठा

कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित। प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम॥ २ ॥

अर्थ:

उसने मोहवश द्रोह किया था, इसलिए यद्यपि उसका वध ही उचित था, पर प्रभु ने कृपा करके उसे छोड़ दिया। श्रीरामजी के समान कृपालु और कौन होगा?