त्वदंघ्रि मूल ये नराः
त्वदंघ्रि मूल ये नराः
छन्द ७, दोहा ४ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
छन्द पाठ
त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सराः। पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले॥ ७ ॥
अर्थ
जो मनुष्य मत्सर (डाह) रहित होकर आपके चरणकमलों का सेवन करते हैं, वे तर्क-वितर्क (अनेक प्रकार के सन्देह) रूपी तरंगों से पूर्ण संसाररूपी समुद्र में नहीं गिरते (आवागमन के चक्कर में नहीं पड़ते)।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “अत्रि मिलन और स्तुति” प्रकरण का छन्द ७, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अत्रि मुनि द्वारा श्रीराम के आश्रम में स्वागत और भावपूर्ण स्तुति का वर्णन है।
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अत्रि मिलन और स्तुति