नमामि भक्त वत्सलं
नमामि भक्त वत्सलं
छन्द १, दोहा ४ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
छन्द पाठ
नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं। भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं॥ १ ॥
अर्थ
हे भक्तवत्सल! हे कृपालु! हे कोमल स्वभाववाले! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निष्काम पुरुषों को अपना परमधाम देनेवाले आपके चरणकमलों को मैं भजता हूँ।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “अत्रि मिलन और स्तुति” प्रकरण का छन्द १, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अत्रि मुनि द्वारा श्रीराम के आश्रम में स्वागत और भावपूर्ण स्तुति का वर्णन है।
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अत्रि मिलन और स्तुति