अनूप रूप भूपतिं
अनूप रूप भूपतिं
छन्द ११, दोहा ४ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
छन्द पाठ
अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं। प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे॥ ११ ॥
अर्थ
हे अनुपम सुन्दर! हे पृथ्वीपति! हे जानकीनाथ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मुझ पर प्रसन्न होइये, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। मुझे अपने चरणकमलों की भक्ति दीजिये।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “अत्रि मिलन और स्तुति” प्रकरण का छन्द ११, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अत्रि मुनि द्वारा श्रीराम के आश्रम में स्वागत और भावपूर्ण स्तुति का वर्णन है।
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अत्रि मिलन और स्तुति