श्रीरामजी का आगे प्रस्थान, विराध वध और शरभंग प्रसंग
वनमार्ग में श्रीराम विराध राक्षस का वध करते हुए आगे बढ़ते हैं। इसके बाद वे शरभंग मुनि से मिलते हैं, जो प्रभु के दर्शन पाकर परम शांति और गति प्राप्त करते हैं।
अरण्यकाण्ड · प्रकरण ५ / १८
प्रकरण पाठ
मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा॥ आगें राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें॥ १ ॥
अर्थ:
मुनि के चरणकमलों में सिर नवाकर देवता, मनुष्य और मुनियों के स्वामी श्रीरामजी वन को चले। आगे श्रीरामजी हैं और उनके पीछे छोटे भाई लक्ष्मणजी हैं। दोनों ही मुनियों का सुन्दर वेष बनाये अत्यन्त सुशोभित हैं।
तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा। देखि दुखी निज धाम पठावा॥ पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा॥ ४ ॥
अर्थ:
[ श्रीरामजी के हाथ से मरते ही] उसने तुरंत सुन्दर (दिव्य) रूप प्राप्त कर लिया। दुखी देखकर प्रभु ने उसे अपने परम धाम को भेज दिया। फिर वे सुन्दर छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजी के साथ वहाँ आये जहाँ मुनि शरभंगजी थे।
सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा॥ तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी॥ ३ ॥
अर्थ:
हे देव! यह कुछ मुझ पर आपका एहसान नहीं है। हे भक्त-मनचोर। ऐसा करके आपने अपने प्रण की ही रक्षा की है। अब इस दीन के कल्याण के लिये तब तक यहाँ ठहरिये, जब तक मैं शरीर छोड़कर आपसे [आपके धाम में न] मिलूँ।
जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा॥ एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा॥ ४ ॥
अर्थ:
योग, यज्ञ, जप, तप, जो कुछ व्रत आदि भी मुनि ने किया था, सब प्रभु को समर्पण करके बदले में भक्ति का वरदान ले लिया। इस प्रकार [दुर्लभ भक्ति प्राप्त करके फिर] मुनि शरभंगजी हृदय से सब आसक्ति छोड़कर उस पर जा बैठे।