सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी
चौपाई १३, दोहा १२१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी॥ होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत॥ १३ ॥
अर्थ
जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निन्दा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं। संतों की निन्दा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोहरूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञानरूपी सूर्य जिनके लिये अस्त हो गया रहता है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ के सात प्रश्न और उत्तर” प्रकरण का चौपाई १३, दोहा १२१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गरुड़ के सात प्रश्नों पर काकभुशुण्डि का आध्यात्मिक उपदेश का वर्णन है।
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गरुड़ के सात प्रश्न और उत्तर