मानस रोग कहहु समुझाई
मानस रोग कहहु समुझाई
चौपाई ४, दोहा १२१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई॥ तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती॥ ४ ॥
अर्थ
फिर मानस-रोगों को समझाकर कहिये। आप सर्वज्ञ हैं और मुझ पर आपकी कृपा भी बहुत है। [काकभुशुण्डिजी ने कहा--] हे तात! अत्यन्त आदर और प्रेम के साथ सुनिये। मैं यह नीति संक्षेप से कहता हूँ।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ के सात प्रश्न और उत्तर” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १२१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गरुड़ के सात प्रश्नों पर काकभुशुण्डि का आध्यात्मिक उपदेश का वर्णन है।
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गरुड़ के सात प्रश्न और उत्तर