नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं
चौपाई ७, दोहा १२१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥ पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया॥ ७ ॥
अर्थ
जगत् में दरिद्रता के समान दुःख नहीं है तथा संतों के मिलन के समान जगत् में सुख नहीं है। और हे पक्षिराज! मन, वचन और शरीर से परोपकार करना, यह संतों का सहज स्वभाव है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ के सात प्रश्न और उत्तर” प्रकरण का चौपाई ७, दोहा १२१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गरुड़ के सात प्रश्नों पर काकभुशुण्डि का आध्यात्मिक उपदेश का वर्णन है।
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गरुड़ के सात प्रश्न और उत्तर