प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा
प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा
चौपाई २, दोहा १२१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा॥ बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी॥ २ ॥
अर्थ
हे नाथ! हे धीरबुद्धि! पहले तो यह बताइये कि सबसे दुर्लभ कौन-सा शरीर है? फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है और सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचारकर संक्षेप में ही कहिये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ के सात प्रश्न और उत्तर” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १२१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गरुड़ के सात प्रश्नों पर काकभुशुण्डि का आध्यात्मिक उपदेश का वर्णन है।
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गरुड़ के सात प्रश्न और उत्तर