कह लंकेस सुनहु रघुनायक

चौपाई ४, दोहा ५० के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥ जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥ ४ ॥

अर्थ

विभीषणजी ने कहा—हे रघुनाथजी ! सुनिये, यद्यपि आपका एक बाण ही करोड़ों समुद्रों को सोखने वाला है, तथापि नीति ऐसी कही गयी है (उचित यह होगा) कि पहले जाकर समुद्र से प्रार्थना की जाय।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “शुक दूत का आना, लक्ष्मण का पत्र” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ५० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में समुद्र पार करने के उपाय, शुक दूत का आगमन और लक्ष्मण के पत्र सहित वापसी का वर्णन है।

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शुक दूत का आना, लक्ष्मण का पत्र