नाथ दैव कर कवन भरोसा

चौपाई २, दोहा ५१ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥ कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥ २ ॥

अर्थ

[लक्ष्मणजी ने कहा--] हे नाथ! दैव का कौन भरोसा! मन में क्रोध कीजिए (ले आइए) और समुद्र को सुखा डालिए। यह दैव तो कायर के मन का एक आधार (तसल्ली देने का उपाय) है। आलसी लोग ही दैव-दैव पुकारा करते हैं।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “शुक दूत का आना, लक्ष्मण का पत्र” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ५१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में समुद्र पार करने के उपाय, शुक दूत का आगमन और लक्ष्मण के पत्र सहित वापसी का वर्णन है।

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शुक दूत का आना, लक्ष्मण का पत्र