कंत समुझि मन तजहु कुमतिही
कंत समुझि मन तजहु कुमतिही
चौपाई १, दोहा ३६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही॥ रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई॥ १ ॥
अर्थ
हे कंत! मन में समझकर कुबुद्धि को छोड़ दो। आपसे और श्रीरघुनाथजी से युद्ध शोभा नहीं देता। उनके छोटे भाई ने एक जरा-सी रेखा खींच दी थी, उसे भी आप नहीं लाँघ सके, ऐसा तो आपका पुरुषत्व है।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मंदोदरी का रावण को पुनः समझाना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मंदोदरी द्वारा रावण को धर्म, नीति और राम के अतुल बल का स्मरण, किन्तु रावण का अहंकारवश अस्वीकार का वर्णन है।
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मंदोदरी का रावण को पुनः समझाना