भंजि धनुष जानकी बिआही

चौपाई ६, दोहा ३६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

भंजि धनुष जानकी बिआही। तब संग्राम जितेहु किन ताही॥ सुरपति सुत जानइ बल थोरा। राखा जिअत आँखि गहि फोरा॥ ६ ॥

अर्थ

वहाँ शिवजी का धनुष तोड़कर श्रीरामजी ने जानकी को ब्याहा, तब आपने उनको संग्राम में क्यों नहीं जीता? इन्द्रपुत्र जयंत उनके बल को कुछ-कुछ जानता है। श्रीरामजी ने पकड़कर, केवल उसकी एक आँख ही फोड़ दी और उसे जीवित ही छोड़ दिया।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “मंदोदरी का रावण को पुनः समझाना” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा ३६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मंदोदरी द्वारा रावण को धर्म, नीति और राम के अतुल बल का स्मरण, किन्तु रावण का अहंकारवश अस्वीकार का वर्णन है।

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मंदोदरी का रावण को पुनः समझाना