सभा माझ जेहिं तव बल मथा
सभा माझ जेहिं तव बल मथा
चौपाई २, दोहा ३७ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
सभा माझ जेहिं तव बल मथा। करि बरूथ महुँ मृगपति जथा॥ अंगद हनुमत अनुचर जाके। रन बाँकुरे बीर अति बाँके॥ २ ॥
अर्थ
जिसने बीच सभा में आकर आपके बल को उसी प्रकार मथ डाला जैसे हाथियों के झुंड में आकर सिंह उसे छिन्न-भिन्न कर डालता है। रण में बाँके अत्यन्त विकट वीर अंगद और हनुमान् जिनके सेवक हैं,।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मंदोदरी का रावण को पुनः समझाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मंदोदरी द्वारा रावण को धर्म, नीति और राम के अतुल बल का स्मरण, किन्तु रावण का अहंकारवश अस्वीकार का वर्णन है।
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मंदोदरी का रावण को पुनः समझाना