तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर
तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर
चौपाई ३, दोहा ३७ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू। मुधा मान ममता मद बहहू॥ अहह कंत कृत राम बिरोधा। काल बिबस मन उपज न बोधा॥ ३ ॥
अर्थ
हे पति! उन्हें आप बार-बार मनुष्य कहते हैं। आप व्यर्थ ही मान, ममता और मद का बोझा ढो रहे हैं! हा प्रियतम! आपने श्रीरामजी से विरोध कर लिया और काल के विशेष वश होने से आपके मन में अब भी बोध नहीं उत्पन्न होता।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मंदोदरी का रावण को पुनः समझाना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मंदोदरी द्वारा रावण को धर्म, नीति और राम के अतुल बल का स्मरण, किन्तु रावण का अहंकारवश अस्वीकार का वर्णन है।
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मंदोदरी का रावण को पुनः समझाना