अब पति मृषा गाल जनि मारहु
अब पति मृषा गाल जनि मारहु
चौपाई ४, दोहा ३६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
अब पति मृषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु॥ पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुलबल जानहु॥ ४ ॥
अर्थ
अब हे स्वामी! झूठी गाल न मारिए, मेरे कहने पर हृदय में कुछ विचार कीजिए। हे पति! आप श्रीरघुपतिजी को राजा मत समझिए, बल्कि अग-जगनाथ और अतुल बलवान जानिए।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मंदोदरी का रावण को पुनः समझाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मंदोदरी द्वारा रावण को धर्म, नीति और राम के अतुल बल का स्मरण, किन्तु रावण का अहंकारवश अस्वीकार का वर्णन है।
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मंदोदरी का रावण को पुनः समझाना