पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा

चौपाई २, दोहा ३६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा॥ कौतुक सिंधु नाघि तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका॥ २ ॥

अर्थ

हे प्रियतम! आप उन्हें संग्राम में जीत पाएँगे, जिनके दूत का ऐसा काम है? खेल से ही समुद्र लाँघकर वह वानरों में सिंह आपकी लंका में निर्भय चला आया!

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “मंदोदरी का रावण को पुनः समझाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मंदोदरी द्वारा रावण को धर्म, नीति और राम के अतुल बल का स्मरण, किन्तु रावण का अहंकारवश अस्वीकार का वर्णन है।

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मंदोदरी का रावण को पुनः समझाना