बरषहिं सुमन सुअंजुलि साजी

चौपाई ४, दोहा १९१ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

बरषहिं सुमन सुअंजुलि साजी। गहगहि गगन दुंदुभी बाजी॥ अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा। बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा॥ ४ ॥

अर्थ

और सुन्दर अज्जलियोंमें सजा-सजाकर पुष्प बरसाने लगे। आकाशमें घमाघम नगाड़े बजने लगे। नाग, मुनि और देवता स्तुति करने लगे और बहुत प्रकारसे अपनी-अपनी सेवा (उपहार) भेंट करने लगे।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १९१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ और रानियों के गर्भवती होने का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ