सीतल मंद सुरभि बह बाऊ
सीतल मंद सुरभि बह बाऊ
चौपाई २, दोहा १९१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ॥ बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा॥ २ ॥
अर्थ
शीतल, मन्द और सुगन्धित पवन बह रहा था। देवता हर्षित थे और संतोंके मनमें [बड़ा] चाव था। वन फूले हुए थे, पर्वतोंके समूह मणियोंसे जगमगा रहे थे और सारी नदियाँ अमृतकी धारा बहा रही थीं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १९१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ और रानियों के गर्भवती होने का वर्णन है।
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दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ