जिमि कुलीन तिय साधु सयानी
जिमि कुलीन तिय साधु सयानी
चौपाई १, दोहा १४५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी॥ रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहू॥ १ ॥
अर्थ
जैसे किसी उत्तम कुलवाली, साधुस्वभाव की, समझदार और मन, वचन, कर्म से पति को ही देवता मानने वाली पतिव्रता स्त्री को भाग्यवश पति को छोड़कर रहना पड़े, उस समय उसके हृदय में जैसे भयानक संताप होता है, वैसे ही मन्त्री के हृदय में हो रहा है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सुमंत्र का शोकमग्न अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुमंत्र का खाली रथ लेकर शोकमग्न अयोध्या में वापसी और राम-वियोग का सर्वत्र विषाद का वर्णन है।
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सुमंत्र का शोकमग्न अयोध्या लौटना