बचनु न आव हृदयँ पछिताई

चौपाई ४, दोहा १४५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई॥ राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई॥ ४ ॥

अर्थ

मुँह से वचन नहीं निकलते। हृदय में पछताते हैं कि मैं अयोध्या में जाकर क्या देखूँगा? श्रीरामचन्द्रजी से शून्य रथ को जो भी देखेगा, वही मुझे देखने में संकोच करेगा (अर्थात् मेरा मुँह नहीं देखना चाहेगा)।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “सुमंत्र का शोकमग्न अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुमंत्र का खाली रथ लेकर शोकमग्न अयोध्या में वापसी और राम-वियोग का सर्वत्र विषाद का वर्णन है।

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सुमंत्र का शोकमग्न अयोध्या लौटना