लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती
लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती
चौपाई ४, दोहा १४८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती॥ राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही॥ ४ ॥
अर्थ
राजा क्षण-क्षण में सोच से छाती भर लेते हैं। ऐसी विकल दशा है मानो [गीधराज जटायु के भाई] सम्पाती के पंख जल जाने पर वह गिर पड़ा हो। राजा बार-बार “राम, राम”, “हे स्नेही राम!” कहते हैं, फिर “हे राम, हे लक्ष्मण, हे बैदेही” ऐसा कहने लगते हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सुमंत्र का शोकमग्न अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १४८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुमंत्र का खाली रथ लेकर शोकमग्न अयोध्या में वापसी और राम-वियोग का सर्वत्र विषाद का वर्णन है।
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सुमंत्र का शोकमग्न अयोध्या लौटना