सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना
सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना
चौपाई २, दोहा १४४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना॥ रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू॥ २ ॥
अर्थ
व्याकुल और दुःख से दीन हुए सुमन्त्रजी सोचते हैं कि श्रीरघुवीर के बिना जीने को धिक्कार है। आखिर यह अधम शरीर रहेगा ही नहीं। अभी श्रीरामचन्द्रजी के बिछुड़ते ही इसने यश क्यों नहीं ले लिया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सुमंत्र का शोकमग्न अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १४४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुमंत्र का खाली रथ लेकर शोकमग्न अयोध्या में वापसी और राम-वियोग का सर्वत्र विषाद का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
सुमंत्र का शोकमग्न अयोध्या लौटना