लोचन सजल डीठि भइ थोरी
लोचन सजल डीठि भइ थोरी
चौपाई २, दोहा १४५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी॥ सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी॥ २ ॥
अर्थ
नेत्रों में जल भरा है, दृष्टि मन्द हो गयी है। कानों से सुनायी नहीं पड़ता, व्याकुल हुई बुद्धि बेठिकाने हो रही है। ओठ सूख रहे हैं, मुँह में लाठी लग गयी है। किन्तु [ये सब मृत्यु के लक्षण हो जाने पर भी] प्राण नहीं निकलते; क्योंकि हृदय में अवधिरूपी किवाड़ लगे हैं (अर्थात् चौदह वर्ष बीत जाने पर भगवान् फिर मिलेंगे, यही आशा रुकावट डाल रही है)।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सुमंत्र का शोकमग्न अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुमंत्र का खाली रथ लेकर शोकमग्न अयोध्या में वापसी और राम-वियोग का सर्वत्र विषाद का वर्णन है।
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सुमंत्र का शोकमग्न अयोध्या लौटना