भए अजस अघ भाजन प्राना

चौपाई ३, दोहा १४४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना॥ अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका॥ ३ ॥

अर्थ

ये प्राण अपयश और पाप के भाँड़े हो गये। अब ये किस कारण कूच नहीं करते (निकलते नहीं)? हाय! नीच मन ने बड़ा अच्छा मौका चूक गया। अब भी तो हृदय के दो टुकड़े नहीं हो जाते!

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “सुमंत्र का शोकमग्न अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १४४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुमंत्र का खाली रथ लेकर शोकमग्न अयोध्या में वापसी और राम-वियोग का सर्वत्र विषाद का वर्णन है।

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सुमंत्र का शोकमग्न अयोध्या लौटना