सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि

दोहा ७८ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि। सरद चंद चंदिनि लगत जनु चकई अकुलानि॥ ७८ ॥

अर्थ

यह शीतल, हितकारी, मधुर और कोमल सीख सुनने पर सीताजी को अच्छी नहीं लगी। [वे इस प्रकार व्याकुल हो गयीं] मानो शरद् ऋतु के चन्द्रमा की चाँदनी लगते ही चकई व्याकुल हो उठी हो।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ से विदाई, सीता का अटल निश्चय” प्रकरण का दोहा ७८ है। इस प्रकरण में राम, सीता और लक्ष्मण द्वारा दशरथ से वन-गमन की विदाई और सीता के अटल निश्चय का वर्णन है।

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दशरथ से विदाई, सीता का अटल निश्चय