सचिव नारि गुर नारि सयानी
सचिव नारि गुर नारि सयानी
चौपाई ४, दोहा ७८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी॥ तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू॥ ४ ॥
अर्थ
मन्त्री सुमन्त्रजी की पत्नी और गुरु वसिष्ठजी की स्त्री अरुन्धतीजी तथा और भी चतुर स्त्रियाँ स्नेह के साथ कोमल वाणी से कहती हैं कि तुमको तो [राजा ने] वनवास दिया नहीं है। इसलिये जो ससुर, गुरु और सास कहें, तुम तो वही करो।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ से विदाई, सीता का अटल निश्चय” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ७८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राम, सीता और लक्ष्मण द्वारा दशरथ से वन-गमन की विदाई और सीता के अटल निश्चय का वर्णन है।
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दशरथ से विदाई, सीता का अटल निश्चय