कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं
कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं
चौपाई ३, दोहा ७६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं॥ भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा॥ ३ ॥
अर्थ
सब हाथ मल रहे हैं और सिर धुनकर पछता रहे हैं। मानो बिना पंख के पक्षी व्याकुल हो रहे हों। राजद्वार पर बड़ी भीड़ हो रही है। अपार विषाद का वर्णन नहीं किया जा सकता।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ से विदाई, सीता का अटल निश्चय” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ७६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राम, सीता और लक्ष्मण द्वारा दशरथ से वन-गमन की विदाई और सीता के अटल निश्चय का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
दशरथ से विदाई, सीता का अटल निश्चय