लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे

चौपाई ४, दोहा ४३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे॥ रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए॥ ४ ॥

अर्थ

कैकेयी के बुरे मुख में ये शुभ वचन कैसे लगते हैं जैसे मगध देश में गया आदिक तीर्थ! श्रीरामचन्द्रजी को माता कैकेयी के सब वचन ऐसे अच्छे लगे जैसे गङ्गाजी में जाकर [अच्छे-बुरे सभी प्रकार के] जल शुभ, सुन्दर हो जाते हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-कैकेयी-संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा कैकेयी की आज्ञा को सहज भाव से स्वीकार कर वनवास के लिए तत्पर होने का वर्णन है।

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श्रीराम-कैकेयी-संवाद