मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति
मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति
दोहा ४१ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर। तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर॥ ४१ ॥
अर्थ
वन में विशेष रूप से मुनियों का मिलाप होगा, जिसमें मेरा सभी प्रकार से कल्याण है। उसमें भी, फिर पिताजी की आज्ञा और हे जननी! तुम्हारी सम्मति है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-कैकेयी-संवाद” प्रकरण का दोहा ४१ है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा कैकेयी की आज्ञा को सहज भाव से स्वीकार कर वनवास के लिए तत्पर होने का वर्णन है।
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श्रीराम-कैकेयी-संवाद