राउ धीर गुन उदधि अगाधू
राउ धीर गुन उदधि अगाधू
चौपाई ४, दोहा ४२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि तें कछु बड़ अपराधू॥ जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सति भाऊ॥ ४ ॥
अर्थ
क्योंकि महाराज तो बड़े ही धीर और गुणों के अथाह समुद्र हैं। अवश्य ही मुझसे कोई बड़ा अपराध हो गया है, जिसके कारण महाराज मुझसे कुछ नहीं कहते। तुम्हें मेरी सौगन्ध है, माता! तुम सच-सच कहो।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-कैकेयी-संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा कैकेयी की आज्ञा को सहज भाव से स्वीकार कर वनवास के लिए तत्पर होने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
श्रीराम-कैकेयी-संवाद