मन मुसुकाइ भानुकुल भानू
मन मुसुकाइ भानुकुल भानू
चौपाई ३, दोहा ४१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मन मुसुकाइ भानुकुल भानू। रामु सहज आनंद निधानू॥ बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन॥ ३ ॥
अर्थ
सूर्यकुल के सूर्य, स्वाभाविक ही आनन्दनिधान श्रीरामचन्द्रजी मन में मुसकराकर सब दूषणों से रहित ऐसे कोमल और सुन्दर वचन बोले जो मानो वाणी के भूषण ही थे--।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-कैकेयी-संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ४१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा कैकेयी की आज्ञा को सहज भाव से स्वीकार कर वनवास के लिए तत्पर होने का वर्णन है।
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श्रीराम-कैकेयी-संवाद