सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी

चौपाई २, दोहा ४२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी॥ तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं॥ २ ॥

अर्थ

जो कल्पवृक्ष को छोड़कर रेंड़ की सेवा करते हैं और अमृत त्यागकर विष माँग लेते हैं, हे माता! तुम मन में विचारकर देखो, वे (महामूर्ख) भी ऐसा मौका पाकर कभी न चूकेंगे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-कैकेयी-संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा कैकेयी की आज्ञा को सहज भाव से स्वीकार कर वनवास के लिए तत्पर होने का वर्णन है।

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श्रीराम-कैकेयी-संवाद