सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू
सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू
चौपाई १, दोहा ४० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू॥ सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरीं गनि लेई॥ १ ॥
अर्थ
राजा के ओठ सूख रहे हैं और सारा शरीर जल रहा है, मानो मणि के बिना साँप दुःखी हो रहा हो। पास ही क्रोध से भरी कैकेयी को देखा, मानो [साक्षात्] मृत्यु ही बैठी [राजा के जीवन की अन्तिम] घड़ियाँ गिन रही हो।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-कैकेयी-संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा कैकेयी की आज्ञा को सहज भाव से स्वीकार कर वनवास के लिए तत्पर होने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
श्रीराम-कैकेयी-संवाद