भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू
भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू
चौपाई १, दोहा ४२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजू॥ जौं न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा॥ १ ॥
अर्थ
और प्राणप्रिय भरत राज्य पावेंगे। [इन सभी बातों को देखकर यह प्रतीत होता है कि] आज विधाता सब प्रकार से मुझे सम्मुख हैं (मेरे अनुकूल हैं)। यदि ऐसे काम के लिये भी मैं वन को न जाऊँ तो मूर्खों के समाज में सबसे पहले मेरी गिनती करनी चाहिये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-कैकेयी-संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा कैकेयी की आज्ञा को सहज भाव से स्वीकार कर वनवास के लिए तत्पर होने का वर्णन है।
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श्रीराम-कैकेयी-संवाद