तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता

चौपाई २, दोहा ४३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता॥ राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू॥ २ ॥

अर्थ

हे तात! तुम अपराध के योग्य नहीं हो (तुमसे माता-पिता का अपराध बन पड़े, यह सम्भव नहीं)। तुम तो माता-पिता और भाइयों को सुख देनेवाले हो। हे राम! तुम जो कुछ कह रहे हो, सब सत्य है। तुम पिता-माता के बचनों में तत्पर हो।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-कैकेयी-संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा कैकेयी की आज्ञा को सहज भाव से स्वीकार कर वनवास के लिए तत्पर होने का वर्णन है।

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श्रीराम-कैकेयी-संवाद