जनु कठोरपनु धरें सरीरू

चौपाई २, दोहा ४१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू॥ सबु प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई॥ २ ॥

अर्थ

[इस सारे साज-सामान के साथ] मानो स्वयं कठोरपन श्रेष्ठ वीर का शरीर धारण करके धनुषविद्या सीख रहा है। श्रीरघुनाथजी को सब हाल सुनाकर वह ऐसे बैठी है, मानो निष्ठुरता ही शरीर धारण किये हुए हो।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-कैकेयी-संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा कैकेयी की आज्ञा को सहज भाव से स्वीकार कर वनवास के लिए तत्पर होने का वर्णन है।

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श्रीराम-कैकेयी-संवाद