तन पुलक निर्भर प्रेम पूरन नयन
तन पुलक निर्भर प्रेम पूरन नयन
छन्द, दोहा ६ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
छन्द पाठ
तन पुलक निर्भर प्रेम पूरन नयन मुख पंकज दिए। मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए॥ जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई। रघुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई॥
अर्थ
मुनि अत्यन्त प्रेम से पूर्ण हैं; उनका शरीर पुलकित है और नेत्रों को श्रीरामजी के मुखकमल में लगाये हुए हैं। [मन में विचार रहे हैं कि] मैंने ऐसे कौन-से जप-तप किये थे, जिसके कारण मन, ज्ञान, गुण और इन्द्रियों से परे प्रभु के दर्शन पाये। जप, योग और धर्म-समूह से मनुष्य अनुपम भक्ति को पाता है। श्रीरघुवीर के पवित्र चरित को तुलसीदास रात-दिन गाता है॥।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “अनसूया का सीता को उपदेश” प्रकरण का छन्द, दोहा ६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीता और अनसूया के मिलन तथा अनसूया द्वारा पातिव्रत धर्म के उपदेश का वर्णन है।
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अनसूया का सीता को उपदेश