छन सुख लागि जनम सत कोटी
छन सुख लागि जनम सत कोटी
चौपाई ९, दोहा ५ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
छन सुख लागि जनम सत कोटी। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी॥ बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥ ९ ॥
अर्थ
क्षणभर के सुख के लिये जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुःख को नहीं समझती, उसके समान दुष्ट कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पातिव्रत-धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त करती है।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “अनसूया का सीता को उपदेश” प्रकरण का चौपाई ९, दोहा ५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीता और अनसूया के मिलन तथा अनसूया द्वारा पातिव्रत धर्म के उपदेश का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
अनसूया का सीता को उपदेश