अब जानी मैं श्री चतुराई
अब जानी मैं श्री चतुराई
चौपाई ४, दोहा ६ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई॥ जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई॥ ४ ॥
अर्थ
अब मैंने श्री चतुराई समझी, जिन्होंने सब देवताओं को छोड़कर आप ही को भजा। जिसके समान [सब बातों में] अत्यन्त बड़ा और कोई नहीं है, उसका शील भला, ऐसा क्यों न होगा ?।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “अनसूया का सीता को उपदेश” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीता और अनसूया के मिलन तथा अनसूया द्वारा पातिव्रत धर्म के उपदेश का वर्णन है।
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अनसूया का सीता को उपदेश